हॉलोंग और नदी


मैं ठोकर खाता हूँ, गिरता हूँ, उठता हूँ — या नहीं।
ध्यान लगाकर चलता हूँ तो भी ठोकर खाता हूँ; बिना ध्यान लगाए चलता हूँ तो और ठोकर खाता हूँ।
कुछ हाथ नहीं आता; यह केवल किस्मत है कि मैं बच जाता हूँ। कहते हैं, शांति भीतर खोजो।
पर भीतर कहाँ है? भीतर भी तो मैं ही हूँ — अच्छा भी, बुरा भी, संपूर्ण भी, विखंडित भी।

ब्रह्मपुत्र के उत्तर तट पर खड़ा है हॉलोंग — असम का राजवृक्ष।
आकाश को छूता है, बादलों से संवाद करता है। इसके बीज पंखों वाले छोटे-छोटे हेलिकॉप्टर हैं,
जो आठ सौ फीट ऊपर से घूमते, नाचते, उतरते हैं।

फिर भी वे दक्षिण तट तक कभी नहीं पहुँचते। नदी बहुत चौड़ी है और बीज के पास कोई इंजन नहीं।
यदि उसके नीचे बैठो और किसी बीज पर नज़र गड़ाओ, तो वह आपके हाथ से फिसल जाएगा।
जिसे चाहा, वह कभी हाथ नहीं आता; कोई और, अनचाहा, हथेली पर आ गिरता है।

हॉलोंग उत्तर से दक्षिण क्यों नहीं जाता? क्या नदी रोकती है, या मिट्टी का मोह है? रहस्य है।
पेड़ ऊँचे हैं, बीज असंख्य हैं, जंगल घना है। फिर भी एक चूक, एक ग़लत उतरना — स्वाहा।
नदी पार करना तो बहुत दूर की बात है, जड़ पकड़ पाना ही सबसे बड़ा संघर्ष है।

मनुष्य भी बीज की तरह है। ध्यान लगाए तो भी चूकता है, ध्यान छोड़े तो और चूकता है।
शांति भीतर है — पर भीतर कोई सरल आँगन नहीं। वहाँ भी अंधेरा है और उजाला है, उत्सव है और अशांति है।
मनुष्य कोई लेंस नहीं है, कि रोशनी समेट ले और सब कुछ स्पष्ट कर दे। जीवन बचना ध्यान का नहीं, भाग्य का खेल है।

A tall tree with green leaves stands by a riverbank, with several winged seeds spiraling downward from its branches against a backdrop of lush greenery and a clear blue sky.



हॉलोंग का असली युद्ध नदी पार करने का नहीं है। असली युद्ध है गिरने का।
हर बीज एक दांव है। हवा का झोंका, ज़मीन की नमी, पत्तों की छाया — किसी एक चूक में जीवन मिट जाता है।

चार सूत्र:
1. प्रचुरता जीवन नहीं बचाती — हज़ार बीज गिरें, पर उगता वही है जिसे भाग्य थाम ले।
2. हर गिरावट एक युद्ध है — और ज़रा-सी भूल, अंत है।
3. ध्यान से परिणाम सुनिश्चित नहीं होता — भाग्य बीच में आ खड़ा होता है।
4. नदी पार करना माया है — असली परीक्षा पार जाने की नहीं, सही जगह उतरने की है।

हॉलोंग खड़ा है — नदी नहीं लांघता, पर अपनी ही धरती पर आकाश की ऊँचाई को छू लेता है।
मनुष्य भी शायद ऐसा ही है। शांति कहीं और नहीं, नदी के उस पार नहीं। वह यहीं है —
ठोकरों में, गिरने और उठने में, बीज के घूमते हुए धीरे-धीरे उतरने में।


Discover more from paoofphysics.in

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Discover more from paoofphysics.in

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading