
दलविंदर की नेकनीयत दुविधा और भाषा की असंभवता
6 सितम्बर, 2025
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लेखक: नरिंदर
श्रेणियाँ: बोपाराय की दास्तानें, अब्सर्डिज़्म, सामाजिक-नृवंशशास्त्र
पहला प्रसंग: दलविंदर का मामला
बोपाराय दफ़्तर में बैठे थे। ब्रिगेडियर सुधर्शनन, कमांडेंट, ने उन्हें दो परिवारों के बीच हुए विवाद की जाँच सौंप दी। आदेश साफ था — न्यायपूर्ण जाँच करो, लेकिन साथ ही दाँत पीसते हुए यह भी कहा कि “मुझे एक उदाहरण कायम करना है।”
कमरे में एक वरिष्ठ महिला अधिकारी भी बैठी थीं, बेहद सुंदर। तभी आरोपी को बुलाया गया। यह था दलविंदर — एक मज़बूत, सुडौल, चालीस वर्षीय सिख। रूपवान, सजीला, सभ्य आचरण वाला और निर्दोष-सा।
उसका एकमात्र धब्बा — भर्ती के समय रामगढ़ सिख ट्रेनिंग सेंटर में एक छोटे से विद्रोह में उसका शामिल होना। बाद में उसे डीएससी (Defence Service Corps) में बहाल किया गया और वह गार्ड ड्यूटी करता था।
घटना
रविवार को वह स्नानघर में बाल धो रहा था। तभी पत्नी ने पुकारा — “दरजी, पानी गाड़ी वाले ने बंद कर दिया।”
दलविंदर को ग़ुस्सा आ गया। उसे पहले से शंका थी कि पानी वाला नीचे रहने वाले उड़ीया दम्पत्ति को ज़्यादा पानी देता है। वे चाय-नाश्ता कराते, हँस-बोल कर पानी मोल लेते। scarcity ने माहौल बिगाड़ रखा था।
तौलिये में भीगा हुआ ही वह नीचे दौड़ा और बोला: “काके, तू पानी क्यों बंद करता है? तैनू सारा पानी इन्हां नूं ही देना ऐ? बहनचोदिया! ए तैनू की देंदे ने — चाय? तू साडे घर भी आ, चाय पी, पर पानी पूरा दे।”
इस पर उड़ीया औरत बाहर आई और बोली — “आप ये क्या लड़ाई कर रहे हैं, और इतनी गंदी गालियाँ?”
दलविंदर ने सीधा जवाब दिया — “मैं बहनचोदी औरतां नाल गल्ल नहीं करदा।”
आस-पास लोग तमाशा देख कर हँस रहे थे। मामला कोर्ट ऑफ़ इन्क्वायरी तक पहुँचा।
जाँच
औरत ने सधे हुए, साफ-सुथरे शब्दों में बयान दिया। दलविंदर ने अपनी सफ़ाई दी — “एदा तां साडे पंजाब विच रोज़ दी गल्ल ऐ। जदो मां रोटियाँ बनांदी ऐ, तां असी उन्हूं बोलदे — ‘मैयो वे, रोटियाँ फुल्लियाँ क्यूँ नहीं ने?’”
यह सुनकर बोपाराय ठहाका मारकर हँस पड़े। महिला अधिकारी भी मुस्कुरा उठीं।
नतीजा: गलतफहमी और सांस्कृतिक भाषा की रंगीन शैली — कोई सज़ा नहीं।
लेकिन सैनिक सम्मेलन में कमांडेंट ने दाँत पीसकर चेतावनी दी।
दूसरा प्रसंग: नुब्रा की संबोधनों की नदी
१. ‘जी’ से आरम्भ
किसी को नाम से बुलाना एक बात है, लेकिन वरिष्ठों को जी कहना दूसरी। यह मात्र प्रत्यय नहीं, बल्कि जीव है — जीवन की चिनगारी।
२. शिर और श्री
फिर आता है श्रीमान, श्रीमती, जनाब, हुज़ूर, सर।
३. संयुक्त संबोधन
सरजी, डॉक्टर साहब, मास्टरजी, पहलवानजी।
४. जब ज़ुबान फिसले
तभी गाली भी संबोधन बन जाती है — बहनचोद, मादरचोद।
५. पश्चिम की ओर
उनके पास है — फक, बास्टर्ड, बिच, मदरफकर। पर जी जैसा प्रत्यय नहीं।
६. नुब्रा का “बा”
मेरी बेटी नुब्रा कहती थी — “बा।” यही दादीबा, कस्तूरबा से जुड़ता है।
७. उपनाम और विशेषण
कुत्ता, गधा, उल्लू; मोटू, पतलू; अंकल, बॉस।
८. नदी और बाढ़
ऊपर — पूज्य, बीच — अपनापन, नीचे — गालियाँ। नदी फैलती है।
९. सबक
भारत के पास है पूरी नदी: जी से बहनचोद तक।
तीसरा प्रसंग: पश्चिमी तुलना
- सम्मानसूचक पदवी: मिस्टर, मिसेज़, मिज़, डॉक्टर, प्रोफेसर।
- पहला नाम प्रधान: वरिष्ठ-कनिष्ठ सभी पहले नाम से।
- कोई ‘जी’ नहीं: केवल please, thank you या सर/मैम।
- पारिवारिक संबोधन: Uncle, Aunt, Grandma।
- गालियाँ: Fuck, Bastard, Bitch — बहुउपयोगी।
निष्कर्ष
भारत की भाषा-नदी बहुआयामी है — सम्मान, अपनापन, व्यंग्य और गाली सब एक ही प्रवाह में। पश्चिम में भाषा अधिक सपाट और औपचारिक है।
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