एक और शिकार

5 सितम्बर 2025

नरिंदर द्वारा
Chronicles of Bopa Rai, Mythology, Philosophy, Religion

फूल को सोचिए, हाथों से मलकर उसकी गंध लीजिए। अगर वह चमेली है, तो आपके विचार में भी वह चमेली ही है; अगर गुलाब या गेंदा है, तो गंध भी आपके विचार की होगी। अवचेतन, वे कहते हैं—पूरा प्रकाश नहीं, अंधकार भी नहीं, उस सीमा पर जहां प्रकाश और छाया मिलते हैं।

द्रौपदी पूर्णिमा के आकार वाले कुंड से बाहर निकली। सूर्य अभी उगा नहीं था, कोई छाया नहीं थी। बोपा दूर खड़ा मंत्रमुग्ध देखता रहा। पानी की बूंदें उसके केशों से, वक्ष से और अंगों से चिपककर टपक रही थीं। उसने सिर झटका और बूँदें एक गौरवपूर्ण चाप में बिखेर दीं। लगभग किसी मादा कुत्ते जैसी, मेरी कुतिया, बोपा ने एक पल देर से सोचा। तभी घास में छिपा एक युवक पीछे से आकर द्रौपदी को बाँहों में भर लेता है। वह झुककर उसे झटक देती है, मानो एक और बूँद। एक हल्की हँसी—इतने बड़े पर इतनी हल्की।

अरुण के सोलह-घोड़ों वाले रथ के पहले संकेत पर वह जोड़ा छाया में घुल गया। उनका समय समाप्त हो चुका था। उन्होंने देखा कि उषा सूर्य से दूर भाग रही है।

वह झुकी और फिर से उसे झटक दिया, एक और बूँद की तरह, हल्की हँसी—इतने बड़े पर इतनी नन्ही। उषा, सूर्य से भागती हुई, अनंत के नृत्य का पीछा करती हुई। अवचेतन समय समाप्त हो चुका था। अब उषा भागती है और अरुण उसका पीछा करता है उस नित्य के ब्रह्मांडीय नृत्य में—सूर्य उगता है, उषा भागती है, सूर्य पीछा करता है, पर कभी पकड़ नहीं पाता।

यही दुनिया को द्वैत में बाँटता है—दिन और रात।
“पहली बस अब तक आ जानी चाहिए,” बोपा ने सोचा और अपनी दस मिनट की चढ़ाई सड़क तक जारी रखी। पक्षी चहचहा रहे थे, मुर्गा दूसरी चेतावनी दे चुका था, और बस की कठोर आवाज़ घाटी में लिफाफे-सी फैल रही थी। कुछ लोग बाहर आए, उस गाँव के इकलौते अफ़सर की विदाई देखने, उनकी गर्दनें बस का पीछा करती रहीं।

पहला बस-स्टॉप बनलागी पर था। वहाँ दुर्गा का मंदिर था—सिंह पर सवार माँ देवी। बोपा उतरा, जूते उतारे और फूलों के साथ ग्यारह रुपये का चढ़ावा दिया। बनलागी गाँव की मुख्य रक्षक थी। उसके अधीन ग्राम-देवता जिन्हें वीर कहा जाता, हर गाँव में तैनात रहते। ये वीर सफ़ेद घोड़ों पर गाँव की परिक्रमा करते और लोगों को जंगली जानवरों और महामारियों से बचाते।

बहुत कम लोग उन्हें देखते थे, लेकिन उनमें से एक था बोपा राय।

बोपा को सुखद याद आया पिछला दिन, जब जंगली मुर्गे की आवाज़ पर उसने अपनी डबल बैरल उठाई और खेत में तिरछा-टेढ़ा भागा। मुर्गा निश्चिंत था—आदमी उसके पीछे नहीं, वह जानता था। और उसने फिर गर्व से बांग दी, तभी बंदूक दहकी। बोपा का भरोसेमंद बीगल दौड़ता हुआ आया, शिकार के रोमांच में भौंका, और गर्मागर्म मुर्गा पकड़ लाया, थोड़ी छेड़खानी के बाद बोपा के हवाले कर दिया।


लेकिन बोपा की छुट्टी का दूसरा दिन अलग था। युवाओं ने जंगली सूअर का शिकार रचाया। एक गहरी, भीड़भरी घाटी में शिकार करना था। योजना यह थी कि कुत्तों, झाँझ और नगाड़ों से सूअरों को नीचे की ओर खदेड़ा जाए, जहाँ शिकारी घात लगाए खड़े थे।

बोपा अपनी जगह डटा रहा। तभी एक विशाल सुअर गरजता हुआ उस पर टूटा। उसने दो गोलियाँ झोंकीं—सुअर की गति धीमी हुई, मगर रुकी नहीं। उसने बोपा को टक्कर मारी, पिंडली को चीर दिया और आगे बढ़ गया। बोपा गिर पड़ा, फिर उठा, बंदूक भरी और पीछे दौड़ा। कुछ ही मीटर आगे जाकर सुअर धराशायी मिला।



उल्लास के बजाय बोपा उसे मरते हुए देखता रहा। पक्षियों की चहचहाहट थम गई। सुअर ने बोपा की ओर देखा। उसने देखा कि दोनों गोलियाँ गले की एक ही ओर लगी थीं। सोचा—अगर वे दोनों ओर होतीं, तो वह भी सुअर संग स्वाहा हो गया होता। वे दोनों—सुअर और बोपा—समानांतर पड़े रहे, जब तक कि बाकी शिकारी पहुँचे। बोपा घायल था, पर शिकार सफल हुआ। पाँच सूअर मारे गए।

सबसे बड़ा सूअर वही था जो बोपा ने गिराया—कम से कम सौ किलो का। सभी सूअरों को ढोया गया, बोपा के लिए एक अस्थायी स्ट्रेचर बनाया गया। उसके घाव पर कमीज़ बाँध दी गई। कुल चार सौ किलो का माल। समय कम था, क्योंकि वनरक्षक किसी भी वक्त आ सकता था। इसलिए बाल जलाकर खरादने की जगह ब्लेड से खुरच दिया गया, मांस बाँटा गया और हर शिकारी बीस किलो लेकर अपने गाँव लौट गया।

बोपा देखता रहा। अगले दिन उसे तेज़ बुखार और पाँव में दर्द उठने लगा। उसने सूअर का माँस खाने से इनकार कर दिया। पीएचसी के डॉक्टर ने टाँके लगाने से मना किया, बस एंटीबायोटिक का इंजेक्शन, टीटी और आराम बताया। घाव तो भर गया, लेकिन कंपन रह गए।



बोपा जानता था—उसका और सूअर का रिश्ता अटूट था। लगभग हज़ार साल बीत चुके थे, 1150 ईस्वी से, जब उसने पहली बार हत्या की थी। और अब पहली बार वह घायल हुआ था। बुखार और साफ़, गर्म सिर में अचानक महान विक्रमादित्य का चेहरा उभरा—त्रिभुवन मल्लाह। बोपा मुस्कराया।
तीनों लोकों का पहलवान।


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